राष्ट्रनिर्माण में युवाओ के योगदान की जरुरत

युवा किसी भी देश का भविष्य है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ 65 % आबादी 35 वर्ष से कम है। तो आप समझ सकते है कि इस देश के लिये युवाओं का सही दि...

आंदोलन या राजनितिक षड्यंत्र


यू तो भारत का इतिहास आंदोलनों से भरा हुआ है। देश को आज़ादी और सैकड़ो रियासतों का एक होकर एक राष्ट्र का निर्माण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का ही परिणाम है। 1857 में  प्रथम स्वन्त्रता संग्राम से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक दर्जनों आंदोलन जिन्होंए इस राष्ट्र को एक रूप देने में भूमिका निभायी।
और आज़ादी के बाद भी देश मे आज अनेको संगठन और आंदोलन खड़े रहते है। आये दिन देश मे कही ना कही नए संगठन और आंदोलन की खबर मिलती रहती है। 
मगर क्या आज के आंदोलन राष्ट्रहित में लगते है या ये सिर्फ कुछ लोगो की निजी महत्वकांशाओ की पूर्ति के लिये आयोजित होते है। इन आंदोलनों का परिणाम देखकर तो ऐसा ही लगता है। जहाँ जे पी के आंदोलन ने कई छोटी छोटी पार्टीयो को जन्म दिया वही हाल ही के अन्ना आंदोलन ने भी एक नई पार्टी को जन्म दिया। यही नही छोटे छोटे जातिय  आंदोलन भी ऐसे ही प्रतीत होते है चाहे वो  पाटीदार  आंदोलन, गुज़ज़र आंदोलन, जाट आंदोलन, करनी का आंदोलन, दलित आन्दोलन, या किसान आंदोलन, दक्षिण भारत का भाषा आंदोलन । सभी किसी न किसी की राजनीतिक महत्वकांशाओ की पूर्ति के लिये खड़े हुए ही प्रतीत होते है।और ज्यादातर चुनावों के समय किसी को फायदा या नुकसान पहुचने के लिये खड़े होते है और फिर कही गयाब से हो जाते है। ये सब एक राजनीतिक चक्र सा ही प्रतीत होता है।
हमारी मीडिया चाहे वो सोशल मीडिया हो या मेन स्ट्रीम कही न कही टी आर पी या अपने राजनीतिक आकाओ के इशारे पर  इन आन्दोलओ को हवा देते रहते है।
इन आन्दोलनों में कही पटरियां उखड़ी जाती है कही बसे जलायी जाती है। आन्दोलन के नाम पर पूरा उपद्रव मचाया जाता है। 
क्या यही आंदोलन है आज़ादी के 200 साल के संघर्ष में शायद ही कभी देश की संम्पति को इतना नुकसान पहुँचाया गया हो तब तो हम पर शासन भी विदेश का था तब भी आन्दोलन की मर्यादा थी मगर आज अपनी ही सरकारों के विरुद्ध आंदोलनों में कोई मर्यादा नही रखी जाती।
साथ ही ये जातिय आंदोलन किसी को इंसाफ दिलाने के बाजए देश को खंडित करते प्रतीत होते है। देश मे जातिय संघर्ष को बढ़ावा देते है।
जातिय  एकता के नाम पर राष्ट्रीय एकता को खंडित किया जाता है खुद सोचिये ये कहा तक जायज है।
क्या हम निजी स्वार्थ और राजनीतिक हथकंडों से दूर रहकर राष्ट्रहित में कार्ये नही कर सकते।
राजनीति का भी इतना निचला स्तर देश के लिये खतरनाक है । अपना वोटबैंक बनाने और 2-4 सीट के लिये नेता देश को तोड़ने से भी नही चूकते, ये बड़े शर्म की बात है। जाति धर्म मे देश को बाट कर अगर जीत भी लिए तो ऐसे बिखरे देश को कब तक सुरक्षित रख पाओगे।
आज देश के हर जिम्मेदार नागरिक को सोचने की जरूरत है के हम समाज को किस दिशा में ले जा रहे है और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसा देश देना चाहते है। ऐसे कई देश है जो आज गृहयुद्ध की स्तिथि में है क्या हम अपने देश को भी ऐसा  ही बनना चाहते है। 
अगर हम उस भयावह स्तिथि से देश को बचाना चाहते है तो राजनीतिक कठपुतली और एक वोटबैंक बनने से बचना होगा। राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना होगा। राजनीतिक फायदों के लिये खड़े इन आंदोलनों से भी बचना होगा। अफवाओं से बचकर रहना होगा। तभी हम अपने देश को सुरक्षित रख पाएंगे।

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