राष्ट्रनिर्माण में युवाओ के योगदान की जरुरत

युवा किसी भी देश का भविष्य है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ 65 % आबादी 35 वर्ष से कम है। तो आप समझ सकते है कि इस देश के लिये युवाओं का सही दि...

कर्नाटक में लोकतंत्र की हत्या?

कर्नाटक में बना राजनेतिक संकट और सत्ता की लड़ाई और खीच तान कोई नई बात तो नही है मगर क्या सत्ता के लिये सवैधानिक पदों का दुरुपयोग और धन बल खरीद फ़रोख क्या ये लोकतंत्र के लिये सही है।क्या ये जो कर रहे है वो राष्ट्रहित में है ये मारामारी जनता की सेवा के लिये तो नही ये तो सिर्फ सत्ता सुख के लिये है। मगर लोकतंत्र का ये रूप लूटतंत्र ज्यादा दिखयी देता है। मगर इसके लिये क्या सिर्फ बीजेपी दोषी है नही इस घटिया राजनीति की नींव कांग्रेस ने ही रखी थी और और इसकी शुरुआत तो आज़ादी के बाद बनी पहली नेहरू सरकार से ही शुरू हो चुकी थी।
 
कांग्रेस ने गवर्नर के ऑफिस का इस्तेमाल करते हुए विरोधी सरकारों को बर्खास्त करने और विपक्षी दलों को सरकार बनाने से रोकने के कई कुकर्म किए हैं. 
1952 में पहले आम चुनाव के बाद ही राज्यपाल के पद का दुरुपयोग शुरू हो गया. मद्रास (अब तमिलनाडु) में अधिक विधायकों वाले संयुक्त मोर्चे के बजाय कम विधायकों वाली कांग्रेस के नेता सी. राजगोपालाचारी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया जो उस समय विधायक नहीं थे.
भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ईएमएस नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में साल 1957 में चुनी गई. लेकिन राज्य में कथित मुक्ति संग्राम के बहाने तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1959 में इसे बर्खास्त कर दिया
1980 में इंदिरा गांधी ने जनता सरकारों को बर्खास्त कर दिया. गवर्नरों के माध्यम से अपनी पसंद की सरकार बनवाने का प्रयास केंद्र सरकारें करती रही हैं. संविधान के अनुच्छेद 356 का खुलकर दुरुपयोग किया जाता है.
सन 1992 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव राव ने बीजेपी शासित चार राज्यों में सरकारें बर्खास्त कर दी थीं.
कर्नाटक में 1983 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी थी. रामकृष्ण हेगड़े जनता पार्टी की सरकार में पहले सीएम थे. इसके बाद अगस्त, 1988 में एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. राज्य के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने 21 अप्रैल, 1989 को बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया. सुबैया ने कहा कि बोम्मई सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है. बोम्मई ने विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल से समय मांगा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. बोम्मई ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. फैसला बोम्मई के पक्ष में आया
वर्ष 1979 में हरियाणा में देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल की सरकार बनी. 1982 में भजनलाल ने देवीलाल के कई विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया. हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तवासे ने भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. राज्यपाल के इस फैसले से नाराज चौधरी देवीलाल ने राजभवन पहुंच कर अपना विरोध जताया था. अपने पक्ष के विधायकों को देवीलाल अपने साथ दिल्ली के एक होटल में ले आए थे, लेकिन ये विधायक यहां से निकलने में कामयाब रहे और भजनलाल ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया.
ये कुछ उदहारण है समझने के लिये के राजनीति के इस हमाम में सब नंगे है।
राजनीति का ये निचला सत्तर कोई नया नही है । मगर ये देश के लिये अच्छा नही है। क्योकि राजनीति में सत्ता का ये दुरुपयोग कब तानशाही बन जाये कहा नही जा सकता राजनीति की ये सोच ही इमरजेंसी के हालात पैदा करती है । 
मगर क्या है समाधान इस गिरते राजनीतिक स्तर का। क्या जनता के पास कोई अधिकार है या वो सिर्फ वोटबैंक ही है । क्या यही लोकतंत्र है?

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